मजदूरी करके पूरी की पढ़ाई और आज हैं डीएम – फर्श से अर्श तक पहुंचने की कहानी

Success Story : From Labour to DM 

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Vinod Kumar Suman, Chamoli DM

अगर इंसान जिंदगी में कुछ हासिल करने की ठान ले तो बड़ी से बड़ी कठिनाई उसकी राह नहीं रोक सकती, बस इसके लिए इरादा पक्का और हौसले बुलंद होने चाहिए।

मजूदर से कलेक्टर की कुसी तक का सफर तय कर चुके के चमोली (उत्तराखंड) के जिलाधिकारी विनोद कुमार सुमन की सफलता की कहानी भी आज के युवाओं को प्रेरणा दे सकती है।

डीएम विनोद कुमार सुमन की सरलता इसी बात से जाहिर होती है कि वे किसी भी खोमचे वाले को सरल मिजाज में चाय बनाने को कहते हैं। वे इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि सिस्टम को दुरुस्त करना मुश्किल नहीं, बस एक संवेदनशील मन चाहिए।

उत्तर प्रदेश के भदोही के पास जखांऊ गांव के रहने वाले सुमन की जिंदगी किसी संघर्ष से कम नहीं रही। पारिवारिक पृष्ठभूमि को इन शब्दों में बयां करते हैं ‘पिता खेती के साथ ही कालीन बुनते हैं। पांच भाई और दो बहनों में मैं सबसे बड़ा था। जाहिर है परिवार की जिम्मेदारी में पिता का हाथ बंटाना मेरा फर्ज भी था।’ 1987 में विभूति नारायण राजकीय इंटर कालेज ज्ञानपुर से इंटर पास करने के बाद समस्या आई आगे की पढ़ाई की। बहुत मुश्किल हालात में उन्होंने स्नातक के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। विवि में प्रवेश के बाद उनके सामने पैसों की दिक्कत खड़ी हो गई। घर से कभी मनीआर्डर आता कभी नहीं। ऐसे में उन्होंने खुद के दम पर कुछ करने की ठानी। वे किसी को बिना बताए पौड़ी गढ़वाल जिले के श्रीनगर शहर आ गए और घर पत्र भेज बता दिया कि उन्हें तलाशने की कोशिश न करें।

सुमन 1989 के उन दिनों को याद कर बताते हैं कि श्रीनगर पहुंचे तो जेब के पैसे खत्म हो चुके थे। वह एक मंदिर में पहुंचे और पुजारी से शरण मांगी। अगले दिन वह काम की तलाश में निकले। उन दिनों श्रीनगर में एक सुलभ शौचालय का निर्माण चल रहा था। ठेकेदार से मिन्नत के बाद वह वहां मजूदरी करने लगे। मजदूरी के तौर पर उन्हें 25 रुपये रोज मिलते थे। इस बीच उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय में बीए में प्रवेश भी ले लिया। किसी तरह दोनों काम साथ चलते रहे। करीब डेढ़ साल ठेकेदार के साथ मजदूरी करने के बाद उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। अब तक वह परिवार को भी अपने श्रीनगर में होने की खबर दे चुके थे। वर्ष 1992 में प्रथम श्रेणी में बीए करने के बाद सुमन ने पिता की सलाह पर इलाहाबाद लौट आए और यहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में एमए किया। इसके बाद 1995 में उन्होंने लोक प्रशासन में डिप्लोमा किया। 1997 में उनका पीसीएस में चयन हुआ और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तमाम महत्वपूर्ण पदों पर सेवा देने के बाद 2008 में सुमन को आइएएस कैडर मिल गया। नवंबर 2015 में चमोली का जिलाधिकारी बनते ही सुमन ने देखा कि दूर-दराज के छात्र मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र के लिए जिला मुख्यालय गोपेश्वर में भटक रहे हैं। उन्होंने आदेश दिया कि दूर दराज के स्कूलों में प्रमाण पत्र वहीं वितरित किए जाएं। अब बच्चों को गोपेश्वर नहीं आना पड़ता।

विनोद कुमार सुमन बताते हैं कि वह कुछ बनने के लिए घर से निकले थे। उन्होंने इंटरमीडिएट करने के बाद ही तय कर लिया था कि एक न एक दिन प्रशासनिक सेवा में सफल होकर दिखाएंगे।

वह कहते हैं कि अगर दृढ़ निश्चय हो तो कोई भी कठिनाई इंसान को नहीं डिगा सकती।

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